अटल जी का अविस्मरणीय व्यक्तित्व
अटल बिहारी वाजपेयी जनमानस के हृदय में बसे हुए हैं। अतः उनके परिचय की कोई आवश्यकता नहीं है। उनके विषय में अग्रसर होने से पूर्व कवि बिहारी का ये दोहा स्मृति पटल पर उभर आता -
नर की अरू नल नीर की गति एकै कर जोई,
जेतो नीचो वे चले तेतो ऊंचों होय॥
अर्थात मनुष्य तथा नल के पानी की गति एक जैसी होती है जैसे नल का पानी जितना नीचे चलेगा उतना ही ऊंचा जायेगा।
अटल जी नम्र, सहृदय और धरा से जुड़े हुए व्यक्ति थे इसीलिए उन्होने एक महानता प्राप्त की जो सदैव आभासित होती रहेगी। चाहे वह विपक्ष में रहे हों और चाहे सत्ता पक्ष में वह अंगूठी में हीरे की तरह चमकते रहे। वह उस ऊंचाई को पसन्द नहीं करते थे जिसको कवि बिहारी ने अपने इस दोहे में इस प्रकार अभिव्यक्त किया है - बड़े न हूजै गुननि बिनु, विरद बड़ाई पाई।
कनक धतूरे सों कहत, गहनो गड़यो न जाई॥
विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि जो नेता बिना गुण के उभरे वह पानी के बुलबुले की भांति कुछ समय के पश्चात तिरोहित हो गये। वही लोग चमक पाये हैं जिनमें गुण थे और अटल जी उसके अपवाद नहीं थे, इसीलिए अटल जी ने गुणहीन ऊंचाई को पसन्द नहीं किया। उनके हृदय से निस्सृत ये पंक्तियां इस तथ्य को निनादित करती हैं -
केवल ऊंचाई ही काफी नहीं होती,
सबसे अलग-अलग परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा बंटा, शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं, मजबूरी है।
इसीलिए अटल जी के कवित्व हृदय से ये प्रार्थना निकली है-
"मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना,
गैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रूखाई कभी मत देना।"
अटल जी का सम्पूर्ण जीवन तपस्या एवं आदर्श से परिपूर्ण रहा है। वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य थे, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं0 दीन दयाल उपाध्याय जैसे जनसंघ के दिग्गजों के शिष्य रहे। वहीं जब वह संसद में विपक्ष में बैठे थे तब तत्कालीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की प्रशंसा के पात्र बने। पंडित जवाहर लाल नेहरू विद्वानों के पारखी थे और इसी कारण हरिवंशराय बच्चन, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह 'दिनकर', महादेवी वर्मा जैसे साहित्य के चमकते रत्नों को उन्होने आदर दिया और ये सभी उनके सन्निकट थे। जिस प्रकार जौहरी कसौटी पर कस के सोने को परखता है उसी प्रकार नेहरू जी ने अटल जी को परखा और उस युवा व्यक्ति के विषय में कहा कि यह एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा। जब देश में श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और प्रायः सभी विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया था उस काल में भी इंदिरा जी अटल जी से परामर्श लिया करती थी जबकि अटल जी उनकी आलोचना करने में कभी पीछे नहीं रहे।
अटल जी ने उग्र मजदूर संघ के नेता जॉर्ज फर्नाडिस से मित्रता की जो आगे चलकर उनके सहयोगी भी बने। 1942 में गांधी जी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का भाग बने और उन्हे 24 दिन तक आगरा जेल की बच्चा बैरक में रखा गया। यह अटल जी को पहली जेल यात्रा थी।
अपनी असाधारण योग्यता एवं प्रतिभा के परिणामस्वरूप वह आज भी करोड़ो लोगों के हृदय में राज करते हैं इसीलिए उन्हें करोड़ो हृदय का सम्राट भी कहा जाता है। अटल जी उदारवादी थे और उन्होने जीवन में उच्च मूल्यों को कभी नहीं त्यागा। अधिक वर्षों तक प्रतिपक्ष में रहते हुए भी सरकार के जनविरोधी निर्णयों का विरोध करते रहे और जनहित में रचनात्मक सुझावों के पुष्प खिलाते रहे। प्रतिपक्ष में होते हुए भी वह सरकार के अच्छे कार्यो की प्रशंसा करने में पीछे नहीं रहे। अटल जी को भाषणों का धनी कहा जा सकता है। उनके भाषण में एक चुंबकीय लहर थी, एक आकर्षण था, एक मंत्रमुग्ध करने की शक्ति थी। भाषणों में वह आकर्षण, वह विदग्धता, वह साहित्यकता की धारा आज देखने को नहीं मिलती। राजनीति की मरूभूमि में होते हुए भी उनके हृदय की कवित्व सलिल धारा विलुप्त नहीं हुई। इसी कारण अटल जी के व्यक्तित्व में एक असाधारणता व्याप्त थी।
अटल जी की विचारधारा प्रखर राष्ट्रवादी थी, जिसने राष्ट्र को समर्पित करोड़ो लोगों को प्रेरणा प्रदान की। वह अपने उदबोधन में प्रायः कहा करते थे "यह देश जमीन का टुकड़ा मात्र नहीं है, बल्कि जीता जागता राष्ट्र पुरूष है। इस पावन धरती का कंकर-कंकर शंकर है, बूंद-बूंद गंगा जल है। भारत के लिए हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर करने में गौरव और गर्व का अनुभव करूंगा।"
अटल जी चट्टान की भांति अटल थे जो कि 11 और 13 मई 1998 के दिन पोखरण में परमाणु परीक्षण से सिद्ध होता है। अटल जी को सत्ता से मोह नहीं था। 1996 में जब वह 13 दिन के लिए सत्ता में आये थे और उस समय जो संसद में उन्होने भाषण दिया था वह सदैव राजनीति के क्षेत्र में कर्मठ लोगों के लिए एक अनुकरणीय गंगा बनकर प्रवाहित होता रहेगा।